Kaal Trighori Movie Review: क्या यह फिल्म आपके डर के मीटर पर खरी उतरती है?

Kaal Trighori Movie Review – आज हम बात कर रहे हैं उस हॉरर फिल्म की जिसने अपनी रिलीज से पहले ही खूब चर्चा बटोरी ‘काल त्रिघोरी’। हॉरर फिल्में या तो आपको रातों की नींद छीन लेती हैं, या फिर हँसा कर छोड़ देती हैं। यह फिल्म कहाँ खड़ी होती है? आइए, पर्दा उठाते हैं!

Kaal Trighori Movie Review

Kaal Trighori Movie Review

सबसे पहले, कहानी का दिल (The Core Idea)

‘काल त्रिघोरी’ हमें एक ऐसे कॉन्सेप्ट से रूबरू कराती है, जो शायद हमने पहले कभी बॉलीवुड में नहीं देखा। कहानी भारतीय पंचांग के एक बेहद दुर्लभ, ‘त्रिघोरी’ कहे जाने वाले खगोलीय संयोग पर आधारित है। फिल्म कहती है कि जब तीन विशेष अमावस्या/पूर्णिमा तिथियाँ एक साथ आती हैं, तो कोई प्राचीन, भयानक शक्ति जाग उठती है।

यह कॉन्सेप्ट ही फिल्म का ‘हीरो’ है। मुझे यह बात बहुत पसंद आई कि डायरेक्टर नितिन एन. वैद्य ने विदेशी डेमन्स को छोड़कर हमारे अपने मिथकों पर ध्यान केंद्रित किया है। कहानी एक पुरानी, उदास हवेली में सिमटी हुई है जहाँ तीन लोग – रविराज, उनकी पत्नी माधुरी और दोस्त डॉ. मनोज – इस अलौकिक खतरे का सामना करते हैं।

मेरा व्यक्तिगत विचार: हॉरर में जब भी हमारे देश की मिट्टी की खुशबू आती है, तो वह कनेक्शन तुरंत जुड़ जाता है। ‘त्रिघोरी’ नाम ही एक अजीब सा कंपन पैदा करता है!

अभिनय: चेहरे जो आपको बांधे रखेंगे

कलाकारों के चयन में, फिल्म ने कोई कसर नहीं छोड़ी है।

  1. अरबाज खान (डॉ. मनोज): Arbaaz Khan को इस तरह के संयमित और थोड़ा रहस्यमयी किरदार में देखना ताज़गी भरा था। उन्होंने डॉक्टर की बेचैनी और संदेह को बड़े ही सधे तरीके से दिखाया है।
  2. रितुपर्णा सेनगुप्ता (माधुरी): वह फिल्म की भावनात्मक धुरी हैं। माधुरी का किरदार उस पत्नी का है जो विज्ञान और अंधविश्वास के बीच फँसी हुई है। रितुपर्णा ने अपनी आँखों से ही बहुत कुछ कह दिया है।
  3. आदित्य श्रीवास्तव (रविराज): ‘सीआईडी’ वाले ‘अभिजीत’ को एक गंभीर और डरे हुए पति के रूप में देखना मजेदार है। वह अंधविश्वास के प्रतीक बन कर सामने आते हैं।

निर्णय: तीनों मुख्य कलाकारों ने अपने किरदारों को ईमानदारी से निभाया है। यह फिल्म सिर्फ डराने की कोशिश नहीं करती, बल्कि किरदारों के मनोवैज्ञानिक टूटन को भी दिखाती है।

टेक्निकल साइड: क्या आप अंधेरे से डरते हैं?

‘काल त्रिघोरी’ जम्प-स्केयर (अचानक डराना) वाली सस्ती हॉरर फिल्म नहीं है। यह आपको धीरे-धीरे अपने शिकंजे में लेती है।

  • सिनेमैटोग्राफी: अंधेरा, उदासी और हवेली के विशाल, खाली कमरे… कैमरा इन चीज़ों का बेहतरीन इस्तेमाल करता है। हर फ्रेम इतना ‘Claustrophobic’ (दम घोंटने वाला) लगता है कि आप खुद को उस हवेली में फंसा हुआ महसूस करने लगते हैं।
  • बैकग्राउंड स्कोर: यह फिल्म का असली सुपरस्टार है। संगीत का इस्तेमाल तनाव पैदा करने के लिए बहुत प्रभावी ढंग से किया गया है। अजीबोगरीब ध्वनियाँ और कम होती खामोशी, डर के माहौल को मज़बूत करती हैं।

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पर यहाँ एक समस्या है…

फिल्म की गति थोड़ी धीमी है। दूसरे हाफ में, कहानी खुद को थोड़ा खींचती हुई महसूस होती है। करीब ढाई घंटे की लंबाई के चलते, कुछ पल ऐसे आते हैं जब आपका ध्यान भटक सकता है। अगर एडिटिंग थोड़ी क्रिस्प होती, तो यह फिल्म शायद मास्टरपीस बन जाती।

अंतिम राय: देखें या छोड़ दें?

देखिए, अगर आप हॉलीवुड स्टाइल की हॉरर फिल्में (जिसमें खून-खराबा और चीखना-चिल्लाना ज्यादा हो) पसंद करते हैं, तो शायद आपको यह फिल्म थोड़ी धीमी लगे।

लेकिन अगर आप भारतीय मिथकों, जटिल मनोविज्ञान और एक ऐसे हॉरर के फैन हैं जो आपको सोचने पर मजबूर करता है कि ‘यह अभिशाप है या सिर्फ दिमाग का वहम’, तो ‘काल त्रिघोरी’ आपके लिए है। यह बॉलीवुड की हॉरर जॉनर में एक ईमानदार और नया कदम है।

मेरा फाइनल वर्डिक्ट: धीमी शुरुआत के बावजूद, यह फिल्म एक अच्छा माहौल बनाती है। इसे एक बार ज़रूर देखें, लेकिन पॉपकॉर्न के साथ थोड़ी सब्र भी लेकर जाएँ!

रेटिंग: ⭐⭐½ (2.5/5)

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