Gustaakh Ishq Movie Review – यार, सच कहूँ तो बॉलीवुड में रोमांस फ़िल्में देखते-देखते हम थक चुके थे… पर विभु पुरी (Vibhu Puri) द्वारा निर्देशित और मनीष मल्होत्रा द्वारा निर्मित ‘गुस्ताख़ इश्क़’ (Gustaakh Ishq) कुछ अलग ही सुकून लेकर आई है। ये फ़िल्म आपको सीधे 1998 में ले जाती है, जहाँ एक लड़का सिर्फ़ अपनी प्रिंटिंग प्रेस नहीं, बल्कि अपने दिल को भी बचाना चाहता है। यह कहानी आपको पुराने ज़माने के सीधे-सादे इश्क़ की याद दिलाएगी।

Gustaakh Ishq Movie Review
कहानी: जब मोहब्बत और विरासत आमने-सामने हों (1998 का दौर)
फ़िल्म की कहानी 1998 के उस दौर की है, जब मोबाइल फ़ोन का शोर नहीं था। पुरानी दिल्ली के दरियागंज में रहने वाला पप्पन (विजय वर्मा) अपने पिता की प्रिय प्रिंटिंग प्रेस को बेचने से बचाना चाहता है। इसके लिए वह पंजाब के मालेर कोटला जाता है।
उसका मिशन है-रिटायर हो चुके उर्दू शायर अज़ीज़ बेग़ (नसीरुद्दीन शाह) से अपनी शायरी की किताबें छपवाना। बेग़ साहब अब एक घड़ीसाज़ (Watch-repairer) बने हुए हैं और पप्पन को साफ़ मना कर देते हैं।
बस, यहीं एंट्री होती है बेग़ साहब की बेटी, मिन्नी (फ़ातिमा सना शेख) की, जो पति से अलग रहकर एक स्कूल टीचर की ज़िंदगी जी रही है। पप्पन, हार नहीं मानता और उस्ताद से उर्दू सीखने के बहाने उनका शागिर्द (शिष्य) बन जाता है। इस दोस्ती, शायरी और सीखने-सिखाने के बीच, उसे मिन्नी से बेपरवाह इश्क़ हो जाता है। फ़िल्म दिखाती है कि जब दिल की बात, विरासत की बात और उस्ताद के सम्मान की बात एक साथ आ जाए, तो पप्पन क्या फ़ैसला लेता है।
परफॉर्मेंस: कौन किस पर भारी?
फ़िल्म में अभिनय का स्तर इतना ऊँचा है कि मज़ा आ जाता है:
- नसीरुद्दीन शाह (अज़ीज़ बेग़): फ़िल्म का सबसे ख़ास पहलू। उनकी उर्दू की बारीक़ियाँ, शायरी पढ़ने का उनका अंदाज़ और उनकी आँखों का ठहराव आपको बांधकर रखेगा। ऐसा लगेगा जैसे आप किसी उस्ताद को सुन रहे हैं।
- विजय वर्मा (पप्पन): विजय वर्मा (Vijay Varma) को इस तरह के सीधे-सादे, मासूम और रोमांटिक रोल में देखना एक ताज़गी भरा अनुभव है। उर्दू सीखने की उनकी कोशिशें और मिन्नी के लिए उनका संघर्ष दिल को छू लेता है।
- फ़ातिमा सना शेख़ (मिन्नी): फ़ातिमा ने एक मज़बूत, लेकिन भावनात्मक रूप से कमज़ोर महिला का किरदार बड़ी सहजता से निभाया है।
विजय और फ़ातिमा की केमिस्ट्री पुरानी शराब की तरह है – जो धीरे-धीरे चढ़ती है और अपना असर छोड़ जाती है। शरीब हाशमी भी सपोर्टिंग रोल में हमेशा की तरह शानदार रहे हैं।
संगीत: विशाल भारद्वाज और गुलज़ार ने जान भर दी
आप जानते हैं जब विशाल भारद्वाज संगीत दें और बोल गुलज़ार साहब के हों, तो वो महज़ गाने नहीं, बल्कि आत्मा होते हैं। फ़िल्म का संगीत कमाल का है। ‘आप इस धूप में’ या टाइटल ट्रैक ‘उल जलूल इश्क़’ हो, हर गाना आपकी भावनाओं को गहरा करता है। ये वो संगीत है जिसे आप फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी सुनना चाहेंगे।
निर्देशन और हमारा अंतिम फ़ैसला
निर्देशक विभु पुरी ने बहुत साफ़ तौर पर एक धीमी, कविता जैसी फ़िल्म बनाई है। सिनेमेटोग्राफी पुरानी दिल्ली की गलियों और पंजाब के माहौल को एकदम से ज़िंदा कर देती है। हालांकि, हाँ, फ़िल्म की गति थोड़ी धीमी है क्योंकि यह जल्दबाज़ी में कहानी खत्म नहीं करना चाहती, बल्कि किरदारों को महसूस करवाना चाहती है।
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तो, इसे देखें या नहीं?
अगर आप एक ऐसी फ़िल्म देखना चाहते हैं जो शोर-शराबे से दूर, एकदम धीमी आंच पर बनी हो, जिसमें गहरी बातें हों, उर्दू ज़ुबान की मिठास हो, और बेहतरीन अभिनय हो, तो यह फ़िल्म आपके लिए है। इसे मिस मत करना। यक़ीनन, यह ‘गुस्ताख़ इश्क़’ आपको एक सुकून भरी मुस्कान ज़रूर देगी।
हमारा स्कोर: ⭐⭐⭐½ (साढ़े तीन स्टार)