Bison: Kaalamaadan Movie Review – देखो, अगर आपने डायरेक्टर मारी सेल्वराज की पिछली फिल्में देखी हैं, तो आप जानते हैं कि वह सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं परोसते; वह सीधे समाज के गले में हाथ डालकर सवाल पूछते हैं। ‘Bison: Kaalamaadan’ भी वैसी ही है, बस इस बार उन्होंने अपनी कहानी का अखाड़ा कबड्डी को बनाया है।
Bison: Kaalamaadan Movie Review
कहानी: ‘अपना’ होने की कीमत
यह कहानी है कित्तन वेलुसामी (Dhruv Vikram) की। कित्तन गाँव का वो लड़का है जिसके पैर मिट्टी पर पड़ते ही कबड्डी का मैदान थर्रा जाता है। लेकिन दिक्कत यह है कि तमिलनाडु के उस इलाके में, टैलेंट से ज़्यादा आपकी पहचान मायने रखती है। फ़िल्म हमें अर्जुन अवॉर्डी कबड्डी प्लेयर मनथी गणेशन के जीवन से जुड़ी सच्ची प्रेरणा देती है।
कित्तन को भारत के लिए खेलना है, पर पहले उसे अपने ही लोगों के बनाए नियमों से लड़ना है। उसके हर रेड (हमले) में सिर्फ अंक बटोरने की भूख नहीं है, बल्कि सालों का जमा हुआ अपमान और गुस्सा है। आप देखेंगे कि कैसे उसके पिता (पसुपथी) उसे इस खेल से दूर रखना चाहते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि इस देश में एक ‘बायसन’ (जंगली भैंसा) बनने की कीमत क्या चुकानी पड़ती है।
ध्रुव विक्रम: आग है यह लड़का!
सच कहूँ तो, यह ध्रुव विक्रम का सबसे दमदार और ईमानदार काम है। पिछली फिल्मों में वह ‘ठीक-ठाक’ लगे थे, पर यहाँ उन्होंने साबित कर दिया कि वह एक गंभीर एक्टर हैं। कित्तन का किरदार अंदर से जल रहा है। ध्रुव ने उसकी बेबसी, ज़बरदस्त मेहनत और ज्वालामुखी जैसे गुस्से को अपनी आँखों से पर्दे पर उतारा है। जब वह कबड्डी खेलते हैं, तो लगता है जैसे कोई जानवर अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा हो यही वजह है कि इस किरदार को ‘बायसन’ कहा गया है।
जो दिल को छू गया:
- मारी सेल्वराज की पकड़: वह जानते हैं कि कहानी को कहाँ कसना है और कहाँ ढील देनी है। वह हिंसा दिखाते हैं, पर उसका मकसद दर्शाना होता है, न कि महिमामंडन करना। उनकी सिनेमाई भाषा गहरी और असरदार है।
- पसुपथी (पिता): इस फ़िल्म की रीढ़ की हड्डी। बाप-बेटे का रिश्ता और पिता का डर, जो अपने बेटे को सिर्फ ज़िंदा और सुरक्षित देखना चाहता है, आपको रुला देगा।
- कबड्डी सीन: ये नकली नहीं लगते। यहाँ फ़िल्मी हीरोपंथी कम है, और खेल की कच्ची ऊर्जा ज़्यादा है। आपको लगेगा जैसे आप मैदान के किनारे बैठकर साँस रोके मैच देख रहे हैं।
पर थोड़ा ध्यान दें:
- फ़िल्म की लंबाई आपको थोड़ी ज़्यादा लग सकती है। लगभग तीन घंटे का रनटाइम है, और हाँ, सेकंड हाफ (उत्तरार्ध) में कहीं-कहीं कहानी थोड़ी धीमी पड़ जाती है।
- अनुपमा परमेश्वरन का किरदार (रोमांस वाला हिस्सा) ज़रूरी नहीं लगता। मेन कहानी इतनी पावरफुल है कि ये लव ट्रैक थोड़ा भटकाव पैदा करता है।
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अंतिम फैसला: एक ‘मस्ट वॉच’
अगर आप सोचते हैं कि स्पोर्ट्स फ़िल्में बस जीत और हार के बारे में होती हैं, तो ‘Bison: Kaalamaadan’ आपका भ्रम तोड़ देगी। यह फ़िल्म दिखाती है कि एक तबके के लिए खेल का मैदान सम्मान और बराबरी की जंग लड़ने का मैदान होता है। यह कड़वा है, पर सच है, और इसे देखना ज़रूरी है। इसे बड़ी स्क्रीन पर देखें ताकि आप कित्तन की दहाड़ को महसूस कर सकें।
हमारा स्कोर: 4.0 / 5 (बहुत बढ़िया!)
