Dhurandhar Movie Review – ‘धुरंधर’ सिर्फ़ एक और स्पाई फ़िल्म नहीं है, यह एक जासूस की अंदरूनी लड़ाई की कहानी है। डायरेक्टर आदित्य धर, जिन्होंने हमें ‘उरी’ जैसी शानदार फ़िल्म दी थी, इस बार 1999 के आस-पास के एक साहसी मगर गुप्त ऑपरेशन को पर्दे पर लाए हैं।
यह कहानी है ‘हम्ज़ा’ (रणवीर सिंह) की। हम्ज़ा एक ऐसा रॉ एजेंट है जिसे पाकिस्तान के कराची शहर के सबसे खतरनाक इलाके में घुसकर एक बड़ा मिशन पूरा करना है। मगर यह मिशन सिर्फ़ देश के लिए नहीं है; यह उसके निजी ग़म, बदले की आग और अपने अतीत के बोझ से भी जुड़ा है।
फ़िल्म को जिस तरह से अलग-अलग अध्यायों (Chapters) में बांटा गया है, वह इसकी कहानी को बहुत ज़मीन से जुड़ा हुआ (Grounded) महसूस कराता है। हाँ, फ़िल्म थोड़ी लंबी ज़रूर है (लगभग साढ़े तीन घंटे), लेकिन कहानी में जो कसावट है, वो आपको उठने नहीं देगी। यह आपको सोचने पर मजबूर करेगी कि देश की सुरक्षा के लिए हमारे गुमनाम हीरो अपनी ज़िंदगी में क्या-क्या दांव पर लगाते हैं।
Dhurandhar Movie Review
परफॉर्मेंस: कौन दिल जीतता है और कौन रोंगटे खड़े करता है?
रणवीर सिंह को हम अक्सर उनकी हाई-एनर्जी और लाउड किरदारों में देखते हैं, लेकिन ‘धुरंधर’ में उनका संयम (Restraint) देखने लायक है। ‘हम्ज़ा’ का किरदार अंदर से जल रहा है, लेकिन वह अपनी भावनाओं को आँखों में समेटे रखता है। जब वह बोलता है, तो हर शब्द में एक गहराई होती है। रणवीर ने साबित कर दिया है कि वह सिर्फ़ एक स्टार नहीं, बल्कि एक कमाल के एक्टर भी हैं। यह उनकी करियर-बेस्ट परफॉर्मेंस में से एक है।
अक्षय खन्ना (रहमान डकैत): विलेन जो छा गया!
अगर रणवीर ने ज़ोरदार एक्टिंग की है, तो अक्षय खन्ना (Akshaye Khanna) ने उन्हें कड़ी टक्कर दी है। कराची के गैंगस्टर ‘रहमान डकैत’ के रूप में उनका किरदार डरावना और साथ ही दिलचस्प है। उनका शांत, ठंडा और खतरनाक अंदाज़ विलेन के रोल को एक नई परिभाषा देता है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस इतना दमदार है कि जब भी वह पर्दे पर आते हैं, तो माहौल तनावपूर्ण हो जाता है।
सपोर्टिंग कास्ट
आर. माधवन, संजय दत्त और अर्जुन रामपाल जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अपने किरदारों को इतनी ईमानदारी से निभाया है कि कहानी का आधार मजबूत हो जाता है।
तकनीकी जादूगरी: एक्शन जो महसूस होता है!
- एक्शन डिज़ाइन: ‘धुरंधर’ का एक्शन हॉलीवुड जैसा ‘फैंसी’ नहीं है, यह रॉ, क्रूर और यथार्थवादी (Realistic) है। हर फाइट सीन में आपको उस किरदार की हताशा और दर्द महसूस होगा। हाथ से हाथ की लड़ाई (Hand-to-Hand Combat) के सीक्वेंस सांसें रोक देते हैं।
- संगीत और साउंड: फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) (शशवत सचदेव) फ़िल्म की रीढ़ की हड्डी है। यह एक्शन में ज़ोर भरता है और इमोशनल सीन में दिल को छू जाता है। 70-80 के दशक के गानों का इस्तेमाल अभूतपूर्व (Phenomenal) है।
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निष्कर्ष: क्या ‘धुरंधर’ देखने लायक है?
जी हाँ! 100%।
अगर आप एक ऐसी फ़िल्म देखना चाहते हैं जो आपको सीट से बाँधकर रखे, जो आपको हंसाए कम और सोचने पर मजबूर ज़्यादा करे, तो ‘धुरंधर’ आपके लिए ही बनी है।
यह फ़िल्म आपको एक भावनात्मक रोलर-कोस्टर राइड पर ले जाती है, जहाँ देशभक्ति सिर्फ़ नारेबाज़ी नहीं है, बल्कि एक एजेंट के टूटते-बनते दिल की धड़कन है। यह फ़िल्म लंबी ज़रूर है, लेकिन यह हर मिनट वसूली देगी।
हमारी राय: इसे बड़े पर्दे पर देखें, ताकि आप एक्शन और BGM का पूरा अनुभव ले सकें।
