Jatadhara Movie Review – फिल्म ‘जटाधरा’ (Jatadhara) जब अनाउंस हुई, तो साउथ की माइथोलॉजिकल थ्रिलर का तड़का और सोनाक्षी सिन्हा का तेलुगु डेब्यू… सच कहूं तो उम्मीदें काफी थीं। लगा कि अनंत पद्मनाभ स्वामी मंदिर के रहस्य और एक ‘धन पिशाचिनी’ (Dhana Pisachini) की कहानी, डर और भक्ति का एक नया अनुभव देगी। लेकिन, जैसा कि अक्सर होता है, इरादा नेक था पर अंजाम थोड़ा फीका रह गया।
Jatadhara Movie Review
फिल्म की कहानी का कोर आइडिया दमदार है। हमारे सामने है शिवा (सुधीर बाबू), एक घोस्ट हंटर जो भूतों में यकीन ही नहीं करता वो हर चीज़ को विज्ञान की कसौटी पर कसता है। तभी उसके सामने आती है धन पिशाचिनी (Sonakshi Sinha)। यह कोई आम भूत नहीं है, बल्कि सदियों पुराने खजाने की रक्षक, जो लालच के कारण जाग उठी है। शिवा को अपने अतीत के कुछ अनसुलझे धागों को सुलझाते हुए इस डरावनी शक्ति का सामना करना पड़ता है।
- सबसे बड़ी समस्या: यह सुनने में जितनी मज़ेदार लगती है, पर्दे पर उतनी ही बिखरी हुई महसूस होती है। स्क्रिप्ट का फ्लो इतना धीमा है कि इंटरवल तक पहुंचते-पहुंचते दर्शक खुद को ‘जटाधारी’ महसूस करने लगते हैं!
परफॉर्मेंस: कौन जीता, कौन हारा?
- सुधीर बाबू (शिवा): शिवा के किरदार में सुधीर बाबू की ईमानदारी दिखती है। वह एक लॉजिकल किरदार को पर्दे पर उतारने की कोशिश करते हैं, जो उनके इंटेंस लुक से मेल खाता है। लेकिन, कमजोर लेखन के कारण उनके किरदार का संघर्ष कहीं-कहीं खोया-खोया लगता है।
- सोनाक्षी सिन्हा (धन पिशाचिनी): यह उनके करियर का एक नया और बोल्ड एक्सपेरिमेंट है। एक डरावनी आत्मा के रूप में उनका लुक ज़रूर ध्यान खींचता है। पर सच कहूँ तो, धन पिशाचिनी के रूप में उनकी अति-अभिनय (Over-the-Top theatrics) जैसे बार-बार दांत किटकिटाना और अजीबो-गरीब एक्सप्रेशन देना डर पैदा करने के बजाय अनजाने में हास्य पैदा करता है। मुझे लगा कि उनकी एक्टिंग के लिए जो विजन था, वो एग्जीक्यूशन में गड़बड़ा गया।
- बाकी कास्ट: दिव्या खोसला कुमार और शिल्पा शिरोडकर जैसे कलाकार हैं, लेकिन उन्हें करने के लिए बहुत कम जगह मिली है।
तकनीकी खामियां जिसने मज़ा किरकिरा किया
सुपरनेचुरल फिल्मों की जान होते हैं उसके स्पेशल इफेक्ट्स। ‘जटाधरा’ में यह विभाग सबसे कमज़ोर कड़ी साबित होता है।
- VFX: कई डरावने सीन में वीएफएक्स (VFX) इतने कच्चे लगते हैं कि आपको साफ़ महसूस होता है कि आप एक नकली दुनिया देख रहे हैं। हॉरर का माहौल बनाने के लिए विज़ुअल्स को और अधिक परिष्कृत (Refined) होना चाहिए था।
- एडिटिंग और पेस: फिल्म की एडिटिंग और पेस (रफ्तार) इसकी सबसे बड़ी दुश्मन है। कहानी को खींच-खींच कर इतना लंबा किया गया है कि दर्शक बेसब्री से क्लाइमेक्स का इंतज़ार करने लगते हैं।
- डायलॉग्स: कुछ संवाद गहरी बातें करते हैं, लेकिन ज़्यादातर मौकों पर वे या तो अनावश्यक रूप से नाटकीय लगते हैं या फिर कहानी के प्रवाह को तोड़ते हैं।
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अंतिम निर्णय: देखें या छोड़ दें?
‘जटाधरा’ एक ऐसा आइडिया था जिसे अगर सधा हुआ निर्देशन, कसा हुआ स्क्रीनप्ले और बेहतरीन वीएफएक्स मिलता, तो यह भारतीय सिनेमा की एक शानदार सुपरनेचुरल फिल्म बन सकती थी।
यह फिल्म एक मिली-जुली कोशिश है जो पौराणिक कथाओं और आधुनिक थ्रिलर को मिलाने की महत्वाकांक्षा रखती है, लेकिन तकनीकी और रचनात्मक मोर्चे पर मात खा जाती है।
अगर आप सुधीर बाबू या सोनाक्षी सिन्हा के बड़े फैन हैं और बस उनका काम देखना चाहते हैं, तो एक बार देख सकते हैं। वरना, इस फिल्म को बड़े परदे पर देखने के लिए अपने समय और पैसे का निवेश करना थोड़ा जोखिम भरा हो सकता है।
रेटिंग: (मेरा व्यक्तिगत अनुभव) 2/5 ⭐⭐
क्या आप हॉरर-थ्रिलर फिल्मों में वीएफएक्स की क्वालिटी को सबसे ज़्यादा महत्व देते हैं, या कहानी की गहराई को?
