Laalo – Krishna Sada Sahaayate Movie Review – आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और सिनेमा के पर्दे पर छाए ‘लार्जर दैन लाइफ’ एक्शन के बीच, कभी-कभी हमें ऐसी कहानियों की जरूरत होती है जो हमारे मन को शांत कर सकें। ‘लालो – कृष्ण सदा सहायते’ एक ऐसी ही फिल्म है। यह फिल्म किसी सुपरहीरो की नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान के ‘असाधारण विश्वास’ की कहानी है।
आइए जानते हैं कि क्या यह फिल्म वाकई आपके समय के लायक है।
Laalo – Krishna Sada Sahaayate Movie Review
एक ऐसी कहानी जो अपनों जैसी लगती है
फिल्म की शुरुआत होती है एक सीधे-सादे इंसान ‘लालो’ से, जिसकी जिंदगी में परेशानियां तो बहुत हैं, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून है। यह सुकून आता है उसके इस अटूट विश्वास से कि – “कृष्ण सदा सहायते” (भगवान कृष्ण हमेशा साथ हैं)।
कहानी सिर्फ पूजा-पाठ के बारे में नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि कैसे मुश्किल समय में जब अपने भी साथ छोड़ देते हैं, तब एक इंसान की ‘आस्था‘ उसे टूटने से बचाती है। फिल्म में दिखाया गया गांव का परिवेश और वहां की समस्याएं इतनी असली लगती हैं कि आप खुद को कहानी का हिस्सा महसूस करने लगते हैं।
अभिनय जिसने दिल जीत लिया
इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसके कलाकार हैं। ‘लालो’ का किरदार निभाने वाले अभिनेता ने अपनी सादगी से फिल्म में जान फूंक दी है। उनकी एक्टिंग में कोई दिखावा नहीं है; उनकी बेबसी में भी एक ऐसी चमक है जो भगवान पर उनके भरोसे को दर्शाती है।
बाकी कलाकारों ने भी ग्रामीण जीवन के उतार-चढ़ाव और मानवीय ईर्ष्या-द्वेष को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से निभाया है।
फिल्म की 3 सबसे बड़ी खूबियां (Highlights)
- सादगी भरा निर्देशन: निर्देशक ने कहानी को उलझाने के बजाय बहुत ही सरल रखा है, जिससे हर उम्र का व्यक्ति इससे जुड़ सकता है।
- कर्णप्रिय संगीत: फिल्म के भजन और बैकग्राउंड म्यूजिक आपको एक अलग ही शांति का अनुभव कराते हैं। संगीत फिल्म की गति को बोझिल नहीं होने देता।
- सकारात्मक संदेश: फिल्म खत्म होने के बाद आप अपने साथ एक उम्मीद और पॉजिटिविटी लेकर घर जाते हैं।
कुछ कमियां जो खटक सकती हैं
सच कहूं तो, अगर आप बहुत ज्यादा ट्विस्ट, टर्न या सस्पेंस वाली फिल्में पसंद करते हैं, तो शायद आपको यह थोड़ी धीमी लगे। फिल्म का क्लाइमेक्स कुछ लोगों को प्रेडिक्टेबल (अनुमानित) लग सकता है, लेकिन इस तरह की कहानियों में ‘सफर’ ज्यादा मायने रखता है ‘मंजिल’ से।
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आपको यह क्यों देखनी चाहिए?
यह फिल्म हर उस दर्शक के लिए एक बेहतरीन तोहफा है जो अपने परिवार के साथ बैठकर कुछ सार्थक और साफ-सुथरा सिनेमा देखना चाहता है। ‘लालो’ एक शुद्ध संस्कार प्रधान फिल्म है, जो आधुनिकता के शोर के बीच हमारी जड़ों की याद दिलाती है। खास तौर पर जो लोग आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक शांति और प्रेरणा की तलाश में हैं, उन्हें यह फिल्म एक सुखद सुकून का अहसास कराएगी। वहीं, भक्ति भाव में डूबे लोगों के लिए यह एक अनिवार्य अनुभव है, क्योंकि यह कहानी ‘कृष्ण सदा सहायते’ के शक्तिशाली मंत्र को पर्दे पर साक्षात जीवंत कर देती है। कुल मिलाकर, यह फिल्म विश्वास की शक्ति को गहराई से महसूस करने का एक सुनहरा अवसर है।
निष्कर्ष: ‘लालो’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक अहसास है। यह हमें याद दिलाती है कि चाहे हालात कितने भी खराब क्यों न हों, अगर हमारा विश्वास अडिग है, तो मदद का हाथ कहीं न कहीं से जरूर आता है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे आप अपने माता-पिता और बच्चों के साथ बैठकर आराम से देख सकते हैं।
मेरी रेटिंग: 4 / 5 (उन लोगों के लिए जो सादगी और अर्थपूर्ण सिनेमा पसंद करते हैं)।
