Mastiii 4 Movie Review – याद है 2004 की वह ‘मस्ती’ जिसने एडल्ट कॉमेडी का नया दौर शुरू किया था? अब सालों बाद, हमारे पसंदीदा ‘अमर-मीत-प्रेम’ यानी रितेश देशमुख, विवेक ओबेरॉय और आफताब शिवदासानी की तिकड़ी एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौट आई है। फ्रैंचाइज़ी का क्रेज तो जबरदस्त है, लेकिन सवाल यह है: क्या इस बार भी इनकी ‘मस्ती’ में वह पुराना वाला मज़ा है, या यह सिर्फ़ एक थका-हारा दोहराव बनकर रह गई है?
डायरेक्टर मिलाप ज़वेरी (जो इस सीरीज़ से पुराने जुड़े हैं) ने इस बार कॉमेडी का डोज़ बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन सच कहूँ तो, कई जगह यह डोज़ ज़्यादा लाउड महसूस होता है, कम हंसाता है।
Mastiii 4 Movie Review
प्लॉट ट्विस्ट: लव वीज़ा और वाइफ़ का रिवेंज!
फिल्म का बेसिक ढाँचा वही है: तीन शादीशुदा दोस्त अपनी उबाऊ, पत्नियों-के-कंट्रोल वाली ज़िंदगी से परेशान हैं। अमर (रितेश), मीत (विवेक) और प्रेम (आफताब) को शक है कि उनकी पत्नियाँ (जिनके किरदार में एलनाज, श्रेया और रूही हैं) उन्हें धोखा दे रही हैं।
कहानी में नया एंगल तब आता है जब उन्हें ‘कूल’ दोस्त कामराज (Arshad Warsi) से एक फैंसी कॉन्सेप्ट ‘लव वीज़ा’ के बारे में पता चलता है। एक हफ़्ते की ‘मस्ती’ की आज़ादी! अब यहाँ से तीनों निकल पड़ते हैं विदेश, लेकिन असली खेल तो तब शुरू होता है जब उनकी पत्नियाँ भी ‘रिवर्स मस्ती’ का प्लान बनाती हैं! इसके बाद जो पर्दे पर होता है, वह गलतफ़हमी, पीछा करने और डबल-मीनिंग जोक्स का एक बवंडर है।
एक्टिंग रिपोर्ट कार्ड: किसने दिल जीता, किसने किया निराश?
- रितेश देशमुख (अमर): रितेश इस पूरी सीरीज़ के सबसे भरोसेमंद पिलर रहे हैं। उनकी हाजिर-जवाबी और कॉमिक टाइमिंग अभी भी शानदार है। बेजान सीन्स में भी वह जान डालने की कोशिश करते हैं।
- आफताब शिवदासानी (प्रेम): आफताब ने ठीक-ठाक काम किया है। उनकी इनोसेंट वाली एक्टिंग कुछ जगह काम करती है।
- विवेक ओबेरॉय (मीत): विवेक थोड़े निराश करते हैं। उनकी एक्टिंग कई बार ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ लगती है और कुछ सीन्स में वह थके हुए नज़र आते हैं।
- सपोर्टिंग स्टार्स: तुषार कपूर और अरशद वारसी जैसे टैलेंटेड एक्टर्स को यहाँ लगभग बर्बाद किया गया है। उनके किरदारों को और बेहतर लिखा जा सकता था।
क्या चीज़ें मज़ेदार लगीं? (The Positives)
- पुरानी यारी: इन तीनों दोस्तों को एक साथ देखना ही नॉस्टेल्जिया देता है। उनकी दोस्ती वाली केमिस्ट्री अभी भी स्क्रीन पर दिखती है।
- कुछ गुदगुदी: इंटरवल से पहले कुछ जोक्स और सिचुएशन्स ऐसी हैं, जो ख़ामोशी तोड़ने वाली हँसी दे सकती हैं (अगर आप ‘एडल्ट कॉमेडी’ को पसंद करते हैं तो)।
- बदले की थीम: पत्नियों के ‘पलटवार’ की थीम दिलचस्प है और पुरानी ‘मस्ती’ फ़िल्मों से इसे थोड़ा अलग बनाती है।
कहाँ फिल्म लड़खड़ाई? (The Negatives)
- आउटडेटेड कॉमेडी: यह 2004 नहीं है। आज के ज़माने में कॉमेडी बहुत बदल गई है। फिल्म के अधिकांश जोक्स बासी और ज़बरदस्ती के लगते हैं।
- निर्देशन का ढीलापन: मिलाप ज़वेरी ने कहानी को तेज़ रखने की कोशिश की है, लेकिन फिल्म जल्दी ही एक लाउड, शोरगुल वाली कॉमेडी में बदल जाती है। कहीं-कहीं फिल्म फूहड़ता की तरफ झुक जाती है।
- बार-बार वही: फिल्म अपनी लंबाई के कारण खींचती हुई लगती है। एक ही तरह के सीन्स बार-बार दोहराए जाते हैं, जिससे स्क्रीन टाइम मैनेज करना मुश्किल लगता है।
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मेरा फ़ैसला: देखें या ना देखें?
ईमानदारी से कहूँ तो, ‘मस्ती 4’ केवल उन लोगों के लिए है जो इस फ्रैंचाइज़ी के ‘एडल्ट कॉमेडी’ स्टाइल को मिस कर रहे हैं और जो हँसने के लिए किसी भी तरह के लॉजिक को नज़रअंदाज़ करने को तैयार हैं।
अगर आप चतुर, ताज़ा, या पारिवारिक कॉमेडी की तलाश में हैं, तो मैं कहूँगा, इससे दूर रहें। लेकिन अगर आप अपने दोस्तों के साथ एक बार की हल्की-फुल्की, ऊँची आवाज़ वाली ‘चीप’ कॉमेडी के मूड में हैं, जहाँ आपको ज़्यादा दिमाग न लगाना पड़े, तो आप इसे देख सकते हैं।
मेरा फाइनल स्कोर: 5 में से 2 स्टार (2/5)। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे आप देखेंगे, शायद थोड़ा हँसेंगे, लेकिन थिएटर से बाहर आते ही भूल जाएँगे।
चेतावनी: यह फिल्म ‘A’ सर्टिफ़िकेट के साथ रिलीज़ हुई है।
