Rangbaaz The Bihar Movie Review: क्राइम, पॉलिटिक्स और विनीत कुमार सिंह का ज़बरदस्त परफ़ॉर्मेन्स।

Rangbaaz The Bihar Movie Review – जब भी बिहार की राजनीति और अपराध की कहानियाँ पर्दे पर आती हैं, तो एक अजीब-सी बेचैनी और रोमांच का मिश्रण महसूस होता है। ‘रंगबाज़: द बिहार चैप्टर’ भी कुछ ऐसा ही है एक ऐसी कहानी जो आपको सीधे उस दौर में ले जाती है जहाँ डर का कारोबार होता था और सियासत की इमारतें बाहुबल की नींव पर टिकी थीं। यह सिर्फ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि बिहार के एक दौर की धड़कन है, जिसे ज़ी5 पर फ़ीचर-लेंथ फ़िल्म के रूप में पेश किया गया है।

Rangbaaz The Bihar Movie Review

Rangbaaz The Bihar Movie Review

कहानी: ‘साहेब’ बनने का सफर

इस फ़िल्म का केंद्र है हारून शाह अली बेग, जिसे सब ‘साहेब’ कहकर पुकारते हैं। विनीत कुमार सिंह ने इस किरदार को जिया है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे एक आम लड़का, जो शायद अपने फैसलों से बंधा था, धीरे-धीरे अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बनता है और फिर उसी ताकत का इस्तेमाल करके सियासी मंच पर जगह बनाता है।

  • डर और प्यार का संतुलन: हारून की खासियत यह है कि वह एक हाथ से डर फैलाता है, तो दूसरे हाथ से गरीबों की मदद करके उनका ‘रॉबिनहुड’ बन जाता है। यही दोहरापन उसे भीड़ में अलग और सरकारों के लिए ख़तरनाक बनाता है।
  • सत्ता का लेनदेन: फ़िल्म यह दिखाने में सफल रही है कि बिहार की राजनीति में कुर्सी, फाइलें और फैसले कैसे बंद कमरों में तय होते थे। यहाँ हर एहसान का हिसाब होता है और हर चुप्पी की कीमत चुकानी पड़ती है।
  • प्रेरणा: यह कहानी बिहार के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन के जीवन से प्रेरित है, इसलिए इसमें एक जानी-पहचानी सच्चाई का ज़ायका है, जिसे फ़िल्मी रंगत दी गई है।

अभिनय की तपिश: विनीत का दमदार प्रदर्शन

पर्दे पर विनीत कुमार सिंह (Vineet Kumar Singh) की उपस्थिति किसी धमक से कम नहीं है।

विनीत ने हारून के किरदार में एक अजीब-सी शांत क्रूरता को पकड़ा है। उनकी आवाज़ धीमी है, लेकिन हर शब्द में वज़न है यही चीज़ दर्शक को कुर्सी से बांधे रखती है। वह आपको मजबूर करते हैं कि आप उस किरदार के अच्छे और बुरे, दोनों पहलुओं को समझने की कोशिश करें।

सहायक कलाकारों की बात करें, तो राजेश तैलंग और प्रशांत नारायणन (पुलिस अफसर के रूप में) ने माहौल को और गहरा किया है। आकांक्षा सिंह ने सना के रूप में, उस स्त्री का किरदार निभाया है जो साहेब की दुनिया के बीचों-बीच खड़ी होकर सच बोलने का साहस रखती है। टीम ने मिलकर बिहार के उस ग्रे शेड वाले माहौल को जीवंत किया है।

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फाइनल वर्डिक्ट: क्यों देखनी चाहिए यह फ़िल्म?

‘रंगबाज़: द बिहार चैप्टर’ एक ग्लैमर-मुक्त, ज़मीनी क्राइम ड्रामा है। यह उन लोगों के लिए है जो सिर्फ एक्शन नहीं, बल्कि उस माहौल को महसूस करना चाहते हैं जहाँ नैतिकता की परिभाषा समय और ज़रूरत के हिसाब से बदल जाती है। निर्देशक सचिन पाठक ने कहानी को तेज़ रफ़्तार दिया है, जिससे यह एक सिटिंग में ख़त्म करने लायक बन जाती है।

अगर आप ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ जैसी कहानियों के फैन रहे हैं, जहाँ अपराध की बुनियाद पर राजनीति की इमारत खड़ी होती है, तो यह फ़िल्म आपको ज़ोरदार टक्कर देगी।

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