Single Salma Movie Review – नमस्ते दोस्तों! आज का हमारा विषय है हुमा कुरैशी की फ़िल्म ‘सिंगल सलमा’। यह सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं है, बल्कि हमारे समाज के उस आइने को दिखाती है, जहाँ 30 पार कर चुकी एक ‘सिंगल’ लड़की को हर कोने से सवालों के तीर चलाने पड़ते हैं। क्या यह फ़िल्म उस रोज़मर्रा के दबाव को पर्दे पर उतार पाई है? आइए जानते हैं, बिल्कुल अपने अंदाज़ में!
Single Salma Movie Review
कहानी: सलमा का बोझ और उसका सपना
कल्पना कीजिए आप एक ऐसे घर की धुरी हैं जहाँ सबको आपकी ज़रूरत है, पर किसी को आपकी ख़ुशी की परवाह नहीं। यही है लखनऊ की सलमा (Huma Qureshi)। वह अपने परिवार की खातिर सबकुछ कुर्बान कर चुकी है छोटी बहनों की शादी से लेकर पुराने गिरवी रखे घर को छुड़ाने तक। लेकिन समाज और रिश्तेदार बस एक ही सवाल पूछते हैं: “शादी कब करोगी?” 33 साल की सलमा के लिए यह सवाल रोज़ का सच बन चुका है।
जब ज़िंदगी में सिकंदर (श्रेयस तलपड़े) नाम का एक सीधा-सादा, शादी का इच्छुक शख़्स आता है, तो लगता है सब ठीक हो जाएगा। पर तभी आती है लंदन की एक ट्रेनिंग, जो सलमा को पहली बार ‘ख़ुद’ से मिलवाती है। वहाँ उसकी मुलाक़ात मीत (सनी सिंह) से होती है, और यह मुलाक़ात सलमा की दुनिया का नज़रिया बदल देती है। वह पहली बार अपनी इच्छाओं और आज़ादी के बारे में सोचने लगती है। फ़िल्म इसी द्वंद पर टिकी है: परिवार का कर्तव्य बनाम अपना आत्म-सम्मान।
अदाकारी: कहाँ चमकी, कहाँ चूकी?
- हुमा कुरैशी का जादू: हुमा ने सलमा को पूरी गरमाहट और सच्चाई से पर्दे पर उतारा है। जब वह थककर चूर होती है या जब उसके अंदर आत्मविश्वास की एक छोटी सी चिंगारी उठती है हर पल में वह यक़ीन दिलाती हैं कि वह सच में ऐसी ही कोई लड़की हैं जिसे हम सबने कहीं न कहीं देखा है।
- सहयोगी कलाकारों का साथ: श्रेयस तलपड़े ने सिकंदर के किरदार को एक मासूमियत दी है जो आपको उनसे जुड़ाव महसूस कराती है। वहीं, सलमा की दोस्त बनी निधि सिंह और अन्य सहायक किरदारों के संवाद में हल्का-फुल्का हास्य है, जो सीन को हल्का बनाते हैं।
निर्देशक नचिकेत सामंत ने कोशिश तो ज़ोरदार की है कि वह ‘क्वीन’ जैसी फ़िल्मों की विरासत को आगे बढ़ाएँ, लेकिन कहानी कहने का तरीका कहीं-कहीं भटका हुआ लगता है। ऐसा लगता है जैसे निर्देशक एक साथ कई मुद्दों को उठाना चाहते थे, जिससे फ़िल्म थोड़ी खींची हुई महसूस होती है। वहीं, डायलॉग्स में मुदस्सर अज़ीज़ की पकड़ तारीफ़ के काबिल है, उनके पंच सटीक लगते हैं।
संगीत का हाल
दोस्तों, अगर आप गाने सुनकर तरोताज़ा होने के लिए जा रहे हैं, तो शायद थोड़ी निराशा हो सकती है। इस फ़िल्म का संगीत ऐसा नहीं है जो आपके ज़ेहन में बस जाए। यह फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय कई बार धीमा करता हुआ महसूस हुआ।
हमारा अंतिम विचार: क्या यह ‘मस्ट वॉच’ है?
‘सिंगल सलमा’ उन लड़कियों की कहानी है जिन्हें समाज अक्सर अपनी ज़िंदगी की “अनसुलझी पहेली” मानता है। अगर आप एक परिवार-केंद्रित, सरल और दिल को छूने वाली ड्रामा देखना चाहते हैं जिसमें एक महिला के नज़रिए को महत्व दिया गया हो, तो यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए। यह फ़िल्म आपको चौंकाएगी नहीं, पर यह आपको सोचने पर मज़बूर ज़रूर करेगी। हुमा कुरैशी की दमदार मौजूदगी के कारण यह फ़िल्म देखी जा सकती है, भले ही इसकी कहानी में कुछ कड़ियाँ कमज़ोर पड़ गई हों।
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फ़िल्म के मुख्य पहलुओं पर हमारी राय:
- संदेश (Message): फ़िल्म का संदेश सकारात्मक और ज़रूरी है। यह समाज में अकेली महिलाओं को लेकर बनी रूढ़ियों पर सवाल उठाता है।
- हुमा कुरैशी का परफ़ॉर्मेन्स: हुमा कुरैशी का अभिनय शानदार है और वह पूरे दिल से सलमा के किरदार को निभाती हैं।
- कहानी की पकड़: कहानी की पकड़ कहीं-कहीं थोड़ी ढीली पड़ जाती है, जिससे गति धीमी महसूस होती है।
- ओवरऑल अनुभव: कुल मिलाकर, फ़िल्म देखने का अनुभव मीठा और आरामदायक है, पर ख़ास नहीं।
