Uttar Movie Review – आज की दुनिया में जब हमारे हाथ में फ़ोन होता है, तो आँखें अपनों को देखना भूल जाती हैं। मराठी फ़िल्म ‘उत्तर’ इसी कड़वी सच्चाई को बड़े प्यार से दिखाती है। यह सिर्फ एक फ़िल्म नहीं है, यह एक आईने की तरह है, जिसे देखकर आप खुद से पूछेंगे कि क्या मैंने अपनी माँ से आखिरी बार दिल से बात कब की थी?
Uttar Movie Review
कहानी है उमा की, जिनका किरदार रेणुका शहाणे ने निभाया है। उमा एक आकाशवाणी की पुरानी निवेदिका हैं, जिसकी आवाज़ में शहद और ममता घुली हुई है। उनका सारा संसार उनके बेटे निनाद (Abhinay Berde) के इर्द-गिर्द घूमता है। निनाद एक AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की दुनिया में खोया हुआ जीनियस है। उसका समय कोडिंग, एल्गोरिदम और रोबोट से बात करने में कटता है, जबकि माँ का समय उसे देखने और उसका इंतज़ार करने में।
उनके बीच की बातचीत अब “खाना खाया?” और “हाँ/ना” तक सिमट गई है। यह दूरियाँ तब और बढ़ती हैं जब निनाद को अपने कॉलेज के एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए अपनी माँ की ज़िंदगी और भावनाओं को समझना पड़ता है। यही वह मोड़ है, जहाँ टेक्नोलॉजी और भावनाएँ आमने-सामने खड़ी होती हैं। क्या एक जटिल AI प्रोग्राम, माँ के निस्वार्थ प्रेम की नक़ल कर सकता है? फ़िल्म इन्हीं सूक्ष्म, लेकिन मज़बूत सवालों का ‘उत्तर’ तलाशती है।
कलाकारों का दिल छू लेने वाला प्रदर्शन
अगर इस फ़िल्म की जान कोई है, तो वो हैं रेणुका शहाणे। उन्होंने उमा के किरदार को जिया है, सिर्फ निभाया नहीं। उनके चेहरे पर वह ममता, वह अकेलापन और बेटे के लिए वह अनकहा प्यार स्पष्ट झलकता है। उनकी सादगी दर्शकों को सीधे उनके घर के सदस्य जैसी लगती है।
अभिनय बेर्डे ने एक ऐसे युवा को पर्दे पर उतारा है, जो मॉडर्न है, लेकिन अपने ही रिश्तों की उलझन में फंसा है। उनकी बॉडी लैंग्वेज एक व्यस्त, महत्वाकांक्षी और भावनात्मक रूप से असमर्थ बेटे की है, जिससे आज की पीढ़ी आसानी से कनेक्ट कर पाएगी।
क्या फ़िल्म दिल तक पहुँची?
सबसे बड़ा प्लस पॉइंट: फ़िल्म की सबसे बड़ी जीत इसकी ईमानदारी है। यह दिखाती है कि प्रेम और देखभाल के लिए कोई बड़ा ड्रामा नहीं चाहिए, बस समय चाहिए। यह हर भारतीय घर की ‘Silent Conflict’ (शांत संघर्ष) को दर्शाती है।
टेक्नोलॉजी बनाम इमोशन: AI जैसे समकालीन विषय को पारिवारिक रिश्ते के साथ बुनना एक बेहतरीन विचार है। यह हमें याद दिलाता है कि भले ही मशीनें सब कुछ कर सकती हैं, लेकिन माँ की एक आवाज़ में जो सुकून होता है, उसका कोई एल्गोरिदम नहीं होता।
निर्देशन: निर्देशक क्षितिज पटवर्धन ने कहानी को आराम से, बिना किसी हड़बड़ी के बुना है। फ़िल्म में एक ठहराव है, जो भावनाओं को रिसने का मौका देता है।
थोड़ी धीमी क्यों लगी?
फ़िल्म का शुरुआती हिस्सा थोड़ा धीमा लग सकता है, लेकिन यह धीमापन कहानी की नींव रखने के लिए ज़रूरी था। कुछ दर्शक शायद कहानी में AI वाले पहलू को और ज़्यादा गहराई से देखना चाहते थे, लेकिन फ़िल्म का फोकस स्पष्ट रूप से माँ-बेटे के भावनात्मक मिलन पर रहा।
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अंतिम फ़ैसला: ज़रूर देखें या नहीं?
अगर आप बॉलीवुड के शोर-शराबे से दूर, एक शांत, सुरीली और भावनात्मक यात्रा करना चाहते हैं, जो सीधे आपके दिल को छू जाए, तो ‘उत्तर’ ज़रूर देखें। यह फ़िल्म सिर्फ एक संदेश नहीं है, यह एक ज़रूरी रिमाइंडर है – कि दुनिया में सबसे बड़ा ‘उत्तर’ हमेशा आपकी ‘आई’ (माँ) के पास होता है।
हमारी रेटिंग: 5 में से 3 स्टार
