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Haq Movie Review: सिर्फ़ कानून की नहीं, इंसानियत की लड़ाई!

Haq Movie Review – ‘हक़’ को देखकर ऐसा महसूस होता है, जैसे हम किसी बीती हुई सदी की कानूनी लड़ाई की गवाह नहीं, बल्कि अपने आस-पास किसी बेटी, बहन या दोस्त की ज़ोरदार दस्तक सुन रहे हों। यह फ़िल्म मात्र एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं है; यह एक ऐसी कहानी है जो आपको सम्मान, विश्वास और अकेले खड़े होने के मायने सिखाती है।

Haq Movie Review

कहानी: वो पल जब ‘मोहब्बत’ कम पड़ जाती है…

फ़िल्म की बुनियाद 1985 के उस चर्चित शाह बानो केस पर टिकी है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। निर्देशक सुपर्ण वर्मा ने इस बड़ी घटना को एक छोटे से परिवार के अंदरूनी स्याह पन्ने से जोड़कर दिखाया है।

हम शाज़िया बानो (यामी गौतम) से मिलते हैं, जो अपने पति अब्बास खान (इमरान हाशमी) एक जाने-माने वकील के साथ एक साधारण, खुशहाल ज़िंदगी जी रही है। लेकिन वक्त का पहिया घूमता है और अब्बास अपनी पहली पत्नी को छोड़कर दूसरी शादी कर लेता है। जब शाज़िया अपने बच्चों के साथ अपने अधिकार की बात करती है, तो अब्बास धर्म और कानून की आड़ लेकर उन्हें ‘तीन तलाक़’ दे देता है।

बस यहीं से शाज़िया का संघर्ष शुरू होता है। यह संघर्ष सिर्फ पति से गुज़ारे भत्ते का नहीं, बल्कि खुद को ‘नागरिक’ साबित करने का है, जिसके बुनियादी अधिकार उसके धर्म के नाम पर छीने जा रहे हैं।

किरदार: यामी गौतम धर, इमरान हाशमी(Emraan Hashmi), शीबा चड्ढा, दानिश हुसैन निर्देशक: सुपर्ण एस वर्मा

अभिनय की ताक़त: जब कला दिल में उतरती है

इस फ़िल्म का असली ‘हक़’ इसकी परफॉरमेंस को जाता है:

यामी गौतम (शाज़िया बानो): यामी ने इस किरदार को इतना ज़मीनी बनाया है कि उनकी आँखों में दर्द साफ़ झलकता है। उन्होंने चीख़ने या ड्रामा करने के बजाय, अपनी शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ से लड़ाई लड़ी है। अदालत में उनका वह पल, जब वह कहती हैं, “कभी कभी मोहब्बत काफी नहीं होती, इज़्ज़त भी ज़रूरी होती है,” सीधे दिल पर असर करता है।

इमरान हाशमी (अब्बास खान): इमरान ने एक ‘सरलता से डरावने’ इंसान को जिया है। वह चिल्लाकर विलेन नहीं बनता, बल्कि अपनी बड़ी-बड़ी बातों और कानूनी दांव-पेंच के पीछे अपनी संकीर्ण सोच छुपाता है।

फ़िल्म का लेखन इतना दमदार है कि हर संवाद (Dialogue) ऐसा लगता है जैसे किसी ने आपके कानों में फुसफुसाया हो, पर वह आवाज़ पूरे थिएटर में गूंज जाए।

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क्यों ज़रूरी है यह फ़िल्म?

यह फ़िल्म हिन्दू बनाम मुस्लिम का शोर नहीं मचाती। यह केवल उस पितृसत्ता (Patriarchy) पर सवाल उठाती है जो हर धर्म और समाज में औरतों को दबाने का काम करती है। यह दिखाती है कि कैसे नियम-कानून महिलाओं के लिए अलग तरह से काम करते हैं।

निर्देशक सुपर्ण वर्मा ने विषय की संवेदनशीलता को बनाए रखा है। यह फ़िल्म आपको झकझोरती है, आपको सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में इंसानी हक़ की बात करते हैं या सिर्फ पुरानी रूढ़ियों को ढोते हैं?

‘हक़’ मनोरंजन से ऊपर उठकर एक महत्वपूर्ण बातचीत शुरू करने की हिम्मत करती है। इसे ज़रूर देखें यह आपके विचारों पर एक गहरा निशान छोड़ जाएगी।

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