Ikkis Movie Review: केवल एक वॉर फिल्म नहीं, एक पिता के गर्व और बेटे की शहादत की दास्तां

Ikkis Movie Review – साल 2026 की शुरुआत सिनेमाघरों में किसी धमाके से नहीं, बल्कि एक गहरी खामोशी और दिल को छू लेने वाली कहानी के साथ हुई है। फिल्म है ‘इक्कीस’। जब श्रीराम राघवन जैसा निर्देशक ‘अंधाधुन’ वाली अपनी पुरानी शैली को छोड़कर देश के सबसे युवा परमवीर चक्र विजेता की कहानी उठाता है, तो उम्मीदें सातवें आसमान पर होती हैं।

Ikkis Movie Review

क्या यह फिल्म उन उम्मीदों पर खरी उतरती है? चलिए गहराई से जानते हैं।

Ikkis Movie Review

कहानी जो सीने में उतर जाती है

आमतौर पर युद्ध वाली फिल्मों में हमें गोलियां, बम और शोर सुनाई देता है, लेकिन ‘इक्कीस’ हमें उस इंसान से मिलवाती है जो उस वर्दी के पीछे था। फिल्म की कहानी 21 साल के सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) के इर्द-गिर्द बुनी गई है।

फिल्म दो अलग-अलग जज्बातों के बीच चलती है:

  1. एक तरफ 1971 के युद्ध का वो मैदान (बसंतर की लड़ाई) है, जहाँ एक लड़का अपनी जवानी कुर्बान कर देश का इतिहास लिख देता है।
  2. दूसरी तरफ 30 साल बाद (2001) उनके पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल (Dharmendra) का वह सफर है, जब वे पाकिस्तान जाकर उस शख्स से मिलते हैं जिसने उनके बेटे की जान ली थी। यह हिस्सा फिल्म की रूह है।

परफॉर्मेंस: किसने मारी बाजी?

  • अगस्त्य नंदा: एक स्टार किड के तौर पर उन पर भारी दबाव था, लेकिन अगस्त्य ने अरुण खेत्रपाल की मासूमियत और उनके फौजी अनुशासन को बहुत ईमानदारी से जिया है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस बहुत नेचुरल है।
  • धर्मेंद्र पाजी: सच कहूँ तो, यह फिल्म धर्मेंद्र जी के बिना अधूरी होती। जब एक 80-90 साल का पिता अपने 21 साल के शहीद बेटे को याद करता है, तो उनकी आंखों की नमी दर्शकों को भी रुला देती है।
  • जयदीप अहलावत: जयदीप एक ऐसे अभिनेता हैं जो अपनी चुप्पी से भी एक्टिंग कर सकते हैं। एक पाकिस्तानी ऑफिसर के रूप में उन्होंने दुश्मन को ‘विलेन’ नहीं, बल्कि एक ‘इंसान’ की तरह दिखाया है, जो खुद युद्ध के घावों से जूझ रहा है।

रिव्यू: क्यों देखें और क्यों नहीं?

क्या अच्छा लगा (The Goods)

  • ईमानदारी: फिल्म में फालतू की नारेबाजी या ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ वाले सस्ते डायलॉग नहीं हैं।
  • सिनेमैटोग्राफी: टैंकों की लड़ाई के दृश्य इतने असली हैं कि आपको लगेगा आप खुद मैदान में खड़े हैं।

क्या खटका (The Bads)

  1. रफ्तार: अगर आप ‘गदर’ या ‘उरी’ जैसी तेज रफ्तार एक्शन फिल्म ढूंढ रहे हैं, तो यह आपको थोड़ी धीमी लग सकती है।
  2. फ्लैशबैक: बार-बार समय का बदलना (Time-jump) कभी-कभी कहानी के बहाव को तोड़ देता है।

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मेरा नजरिया (Personal Opinion)

‘इक्कीस’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसे आप बस पॉपकॉर्न खाते हुए मनोरंजन के लिए देखें। यह फिल्म आपको घर ले जाने के लिए एक भारीपन और एक नया नजरिया देती है। यह हमें बताती है कि 21 साल की उम्र में जहां हम करियर की चिंता करते हैं, वहां कोई देश के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर खड़ा था।

निष्कर्ष

यदि आप सिनेमा को कला की तरह देखते हैं और सच्ची कहानियों के शौकीन हैं, तो ‘इक्कीस’ आपके लिए साल 2026 की सबसे बेहतरीन फिल्म साबित हो सकती है। इसे अपने परिवार, खासकर अपने दादा-दादी या माता-पिता के साथ जरूर देखें।

रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (4/5)

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