Kairee Movie Review – ज़िंदगी और रिश्तों की कहानी कहने में मराठी सिनेमा का कोई मुकाबला नहीं है। हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म “कैरी” (Kairee) भी इसी कड़ी में एक और नाम है, जो रिश्तों की कच्ची-पक्की डोर और एक लड़की के अप्रत्याशित सफ़र को दिखाती है। मेरे लिए, यह सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि कोंकण की मिट्टी की ख़ुशबू को लंडन की भागमभाग में महसूस करने जैसा अनुभव था।
Kairee Movie Review
कहानी, जो दिल से निकली लगती है
फ़िल्म की नायिका है कावेरी (सायली संजीव), जो कोंकण के एक शांत गाँव की है। उसकी शादी होती है आकाश (शशांक केतकर) से, जो सपनों की नगरी लंडन में कमाता है। शुरूआती सीन में उनकी केमिस्ट्री बड़ी प्यारी लगती है, बिलकुल जैसे गर्मियों की पहली बारिश।
लेकिन, कहानी में असली ट्विस्ट तब आता है जब कावेरी अपनी शादीशुदा ज़िंदगी शुरू करने लंडन पहुँचती है। यहाँ पहुँचते ही, आकाश रहस्यमय तरीके से ग़ायब हो जाता है! सोचिए ज़रा, एक नई जगह, जहाँ न कोई जानने वाला, न भाषा का पूरा ज्ञान, और पति अचानक ग़ायब। कावेरी के सामने न सिर्फ़ आकाश को ढूंढने की चुनौती है, बल्कि उसे अपने पति के बारे में वो सच जानने पड़ते हैं, जो किसी भी पत्नी के लिए दिल तोड़ने वाले हो सकते हैं।
फ़िल्म का यह सस्पेंस भरा पहलू मुझे बांधे रखता है। यह सिर्फ़ एक गुमशुदा व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि एक साधारण सी लड़की विपरीत परिस्थितियों में कितनी मज़बूत बन सकती है।
अभिनय: सायली संजीव की सादगी, मेरी फेवरेट!
अगर मुझे इस फ़िल्म में किसी एक चीज़ को चुनना हो जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आई, तो वह है सायली संजीव (Sayali Sanjeev) का अभिनय। उन्होंने कावेरी के किरदार को इतनी ईमानदारी से निभाया है कि आप तुरंत उससे जुड़ जाते हैं।
शुरूआत में उसका भोलापन, और फिर लंडन की सड़कों पर अकेली घूमती हुई उसकी आँखों में डर, बेबसी और फिर संघर्ष का दृढ़ संकल्प… यह सब देखना एक दर्शक के तौर पर बहुत प्रभावित करता है। वह बिलकुल भी ओवर-एक्टिंग नहीं करतीं, जो इस कहानी की माँग भी थी।
शशांक केतकर अपने रोल में ठीक-ठाक लगे हैं, पर मुझे लगता है कि उनके किरदार में और गहराई की जा सकती थी। वहीं, सिद्धार्थ जाधव और सुबोध भावे जैसे मंझे हुए कलाकारों को देखकर मज़ा आता है। सिद्धार्थ की कॉमिक टाइमिंग कई तनाव भरे पलों में राहत देती है।
निर्देशन और संगीत: कहाँ मन लगा और कहाँ थोड़ी कमी दिखी
निर्देशक शांतनु रोडे ने ‘कैरी’ को एक खूबसूरत रूप दिया है। कैमरा वर्क (सिनेमैटोग्राफी) कमाल का है – कोंकण के हरे-भरे नज़ारे और लंडन की भागदौड़ दोनों को उन्होंने बैलेंस किया है। मेरे लिए यह फ़िल्म आँखों को सुकून देने वाली थी।
लेकिन, पटकथा (Screenplay) थोड़ी धीमी है। खासकर सेकंड हाफ़ में, जब सस्पेंस खुलना शुरू होता है, तो कहानी थोड़ी खींचती हुई महसूस होती है। काश, कुछ दृश्यों को और तेज़ी से दिखाया जाता ताकि रोमांच बना रहता।
संगीत अच्छा है, और बैकग्राउंड स्कोर कहानी की भावनाओं को सपोर्ट करता है। कुछ गाने दिल को छूते हैं, जो कहानी के माहौल को और भी गहरा बनाते हैं।
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आख़िर में, मेरा निजी विचार
“कैरी” कोई ऐसी फ़िल्म नहीं है जो आपको सीट से उछलने पर मजबूर कर दे। यह शांत, धीमी और सहज है। यह हमारे-आपके रिश्तों की तरह है, जहाँ अचानक मुश्किलें आती हैं और हम उनसे लड़कर आगे बढ़ते हैं।
यह फ़िल्म मुझे बताती है कि, दुनिया के किसी भी कोने में, एक लड़की का संघर्ष, उसका आत्मसम्मान और उसकी अपने प्यार को पाने की चाहत कितनी बड़ी हो सकती है। अगर आप एक साफ़-सुथरी, भावनात्मक और थोड़ी-सी रहस्यमयी कहानी देखना चाहते हैं, जहाँ अभिनय मज़बूत हो, तो आप “कैरी” देख सकते हैं। इसे देखते हुए मुझे लगा कि मैंने एक अच्छा और सच्चा प्रयास देखा है।
मेरी रेटिंग: 3.5/5 (केवल पटकथा की धीमी गति के कारण मैंने आधा अंक काटा।)
