Thamma Movie Review – क्या बॉलीवुड की हॉरर-कॉमेडी यूनिवर्स (‘स्त्री’, ‘भेड़िया’) अब ‘घिस’ गई है? इस दिवाली पर आई आयुष्मान खुराना और रश्मिका मंदाना की फ़िल्म ‘थामा’ (Thamma) इसका जवाब देती है। यह फ़िल्म आपको हँसाएगी भी, डराएगी भी, और सबसे ज़रूरी, आपको प्यार की एक अनूठी कहानी से जोड़ेगी।

Thamma Movie Review
कहानी का ‘बीट’: एक पत्रकार को हुआ ‘बेताल’ से प्यार
कहानी है दिल्ली के एक झोलाछाप पत्रकार आलोक गोयल (Ayushmann Khurrana) की, जो वायरल कंटेंट के चक्कर में जंगल में भटक जाता है। यहाँ उसकी जान बचाती है ख़ूबसूरत, मगर रहस्यमय तड़का (रश्मिका मंदाना)। तड़का कोई आम लड़की नहीं, वो है ‘बेताल’ भारतीय लोककथाओं का वो प्राणी जिसे आप देसी ‘वैम्पायर’ कह सकते हैं, लेकिन जो इंसानी खून नहीं पीता।
आलोक को तड़का से पहली नज़र में प्यार हो जाता है, और वो उसे अपने साथ दिल्ली ले आता है। नाम बदलता है, पहनावा बदलता है, पर उसकी ‘बेताल’ पहचान नहीं बदलती। उनका यह इंसान-बेताल प्रेम सदियों से कैद थामा/यक्षासन (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) को आज़ाद होने का मौका दे देता है, और बस यहीं से शुरू होती है असली हॉरर, कॉमेडी और एक्शन की दौड़!
🎭 परफॉर्मेंस: कौन चमका?
- आयुष्मान खुराना एक बार फिर अपनी ‘आम आदमी’ वाली छवि में फिट बैठते हैं, जो हालात बिगड़ने पर हीरो बनता है। उनकी कॉमेडी और संजीदा एक्टिंग का मिश्रण कमाल का है।
- रश्मिका मंदाना इस फ़िल्म की जान हैं। तड़का के रूप में उनका भोलापन और ज़बरदस्त एक्शन देखने लायक है। यह बॉलीवुड में उनकी सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस में से एक है।
- नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को विलेन के रोल में देखना हमेशा मज़ेदार होता है, पर कुछ जगहों पर लगता है कि उनका किरदार सिर्फ़ गुर्राता रह गया, जबकि उनके टैलेंट का इस्तेमाल और बेहतर तरीके से हो सकता था।
- परेश रावल ने आलोक के रूढ़िवादी पिता के रूप में शानदार कॉमेडी की है। पिता-बेटे की तकरार में हंसी के कई बेहतरीन पल हैं।
👍 क्या है फ़िल्म की यूएसपी (USP)?
- इंडियन माइथोलॉजी: फ़िल्म पश्चिमी वैम्पायर कहानियों की नकल नहीं करती, बल्कि ‘बेताल’ के कॉन्सेप्ट को भारतीय टच देती है। इसमें ‘पार्टीशन’ (विभाजन) से जुड़ी एक पुरानी कहानी को बेतालों के खून पीने के नियम से जोड़ना, वाकई एक ताज़ा और बोल्ड प्रयास है।
- रोमांस फ़र्स्ट, हॉरर सेकंड: निर्देशक आदित्य सरपोतदार इसे प्योर हॉरर-कॉमेडी न रखकर, एक सुपरनैचुरल-रोमांस का रूप देते हैं। यह एक अच्छा बदलाव है और फ़िल्म को एक भावनात्मक आधार देता है।
- तकनीकी बनावट: फ़िल्म का VFX और सिनेमैटोग्राफी (‘भेड़िया’ वाले सौरभ गोस्वामी) बेहतरीन है। बेतालों की दुनिया, जंगल, और एक्शन सीक्वेंस बहुत सटीक लगते हैं।
- ‘यूनिवर्स’ कनेक्शन: ‘स्त्री’, ‘भेड़िया’ और ‘मुंज्या’ के संदर्भ और कैमियो फ़ैन्स के लिए एक बोनस हैं, जो इस यूनिवर्स को और मज़बूत बनाते हैं।
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👎 कुछ बातें जो बेहतर हो सकती थीं
- अनइवन पेसिंग: फ़िल्म का पहला हिस्सा थोड़ा धीमा है और कहानी ज़माने में समय लेता है। कुछ गानों को हटाया जा सकता था ताकि फ़िल्म की रफ़्तार बनी रहे।
- कमज़ोर क्लाइमेक्स: इतना बड़ा बिल्डअप देने के बाद, विलेन (यक्षासन) का अंतिम टकराव थोड़ा जल्दबाजी में निपटा हुआ लगता है।
- संगीत: सचिन-जिगर का संगीत ठीक-ठाक है, पर फ़िल्म में ‘स्त्री’ या ‘भेड़िया’ की तरह कोई ब्लॉकबस्टर गाना मिसिंग है।
⭐ अंतिम फ़ैसला: देखें या न देखें?
‘थामा’ Maddock यूनिवर्स की एक और दिलकश एंट्री है। यह ज़रूरी नहीं कि ‘स्त्री’ जितनी ज़बरदस्त हो, लेकिन यह निश्चित रूप से मनोरंजक है। अगर आपको हॉरर-कॉमेडी, फैंटसी और थोड़ा-सा देसी ट्विस्ट पसंद है, तो यह फ़िल्म आपके लिए है।
यह फ़िल्म एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए, खासकर दोस्तों और परिवार के साथ।
हमारी रेटिंग: ⭐⭐⭐ (3/5 स्टार)
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